मधुमक्खी उद्योग PDF  | Print |  E-mail
भारत में शहद एवं मधुमक्खी पालन का पुराना इतिहास रहा है। शहद पहाड़ की गुफाओं तथा वनों में निवास करने वाले प्राचीन भारतीय द्वारा चखा गया प्रथम मीठा भोजन था। उन्होंने इस दैवीय उपहार हेतु मधुमक्खियों के छतें की खोज की। भारत के प्रागैतिहासिक मानव द्वारा कंदराओं में चित्रकला के रूप  में मधुमक्खी पालन का प्राचीनतम अभिलेख मिलता है। सभ्यता के विकास के साथ शहद ने प्राचीन भारतियों के जीवन में अद्वितीय स्थान प्राप्त किया। वे शहद को जादूई पदार्थ मानते थे जो महिलाओं, मवेशी तथा उनकी भूमि एवं फसल की उर्बरता को नियंत्रित करता था। वर्तमान विगत वर्ष, उप हिमालय पर्वतीय श्रेणी तथा पश्चिमी घाट जहाँ इसकी प्रक्रिया सामान्य रूप में होती है,सहित सधन वनीय श्रेत्रो में उद्योग के पुनरूद्धार का प्रमाण है।
भारत में मधुमक्खी पालन मुख्यतः वन आधारित होता है। अनेकों प्राकृतिक वनस्पति प्रजातियाँ शहद हेतु नेक्टर एवं पॉलेन प्रदान करती है। अतः शहद उत्पादन हेतु कच्चा माल प्रकृति से मुफ्त में उपलब्ध हो जाता है। मधुमक्खी के छते के लिए न तो अतिरिक्त भूमि लगती है और न ही किसी उपकरण हेतु कृषि अथवा पशुपालन से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। मधुमक्खी पालकों को मधुमक्खी काँलनियों की निगरानी हेतु केवल कुछ घंटे बिताना पड़ता है। इसलिए, मधुमक्खी उनका पालन आंशिक व्यवसाय है। मधुमक्खी पालन ग्रामीण तथा जनजाति किसानों के लिए धारणीय आय सृजन का साधन बनाता है। इससे उन्हें शहद, प्रोटीनयुक्त पॉलेन एवं ब्रूड़ जैसे मूल्यवान पोषण मिलते है।
परम्परागत ग्रामोद्योग के पुनरूद्धार हेतु खादी और ग्रामोद्योग आयोग की  स्थापना से ही मधुमक्खी पालन के विकास की देशभाल हुई है। वर्ष 1980 के दौरान, खादी और ग्रामोद्योग आयोग की विविध योजनाओं के अंतर्गत लगभग एक मिलियन मधुमक्खी छता ने कार्य किया था। देश में एपियरी शहद का उत्पादन 10,000 टन होता है जिसका मूल्य लगभग रू.300 मिलियन है।
देशज मधुमक्खी, एपिस सेरेना,यूरोपिय मधुमक्खी, एपिस मेलिफेरा मधुमक्खी पालन ने जम्मू व कश्मीर, पंजाब, हिमांचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार एवं पश्चिम बंगाल में प्रसिद्वि प्राप्त की।  वृहत शहद मधुमक्खी तथा प्राच्य छता मधुमक्खी की अन्य शहद मधुमक्खियों ने शहद संग्रह हेतु नष्ट किया जाता है। भारत के अनेक भागों में जनजाति जनसंख्या तथा वन निवासी जंगली शहद मधुमक्खी से शहद संग्रह करते है क्योंकि यह उनका पारंपरिक व्यवसाय है। इन घोषलों से शहद एवं मोम संग्रह की विधि धीरे-धीरे बदल चुकी है। इस शहद का मुख्य उत्पादन क्षेत्र उप हिमाचल तथा समीप के पहाड़ी क्षेत्र, उष्ण कटिबन्धीय वन सहित वन एवं फार्म है तथा इसकी खेती राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र एवं उडीसा और आन्ध्र प्रदेश के पूर्वी घाट में की जाती हैं।